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आह लब पे रही तश्नगी की तरह / सूरज राय 'सूरज'

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आह लब पर रही तश्नगी की तरह।
दर्द दिल में रहा इक नदी की तरह॥

मौत ने भी तो कुछ कम सताया नहीं
साथ बरसों रही ज़िन्दगी की तरह॥

आज उसका पता पूछता है जहां
ख़ुद के घर जो रहा अजनबी की तरह॥

वो मेरी हर कमी पूछते-पूछते
दिल में ख़ुद रह गए इक कमी की तरह॥

तोड़ कर जेल रिश्तों की चाहा तुझे
और तू भी मिला हथकड़ी की तरह॥

मुख़बिरे-मौत था एक लम्हा वो, जो
ज़िन्दगी से मिला ज़िन्दगी की तरह॥

हम तो बचपन से "सूरज" के घर में रहे
धूप लगती है अब चांदनी की तरह॥