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इंडिया गेट / जय छांछा

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इंडिया गेट
मैंने तुम्हें दूर से देखा था
हाँ, सच, बहुत दूर से देखा था ।

नई दिल्ली आने के बाद
मिलना ही था तुमसे
और मिला भी
तुम्हें वैसे ही निहारा
जैसे चाँदनी चौक के व्यापारी
उलट-पलट कर निहारते हैं कागज़ी नोटों को ।

इंडिया गेट
तुम्हारे नज़दीक आकर बहुत-सी बातें करने की चाह थी
हाँ, सच, कुछ कहने की चाह थी मेरी ।
तम्हारे रूप, स्वरूप और विशेषता को
देखना और अनुभव करना
क्रमशः नज़दीक आकर तम्हारे पास
ख़ुद को छोटा होता पाया अपनी ही छाया में
और ख़ुद को खोने का आभास हुआ तुम्हारी छाया में ।

इंडिया गेट
तम्हारे साथ हुई भेंट, तो
शहीद गेट आंखों के आगे तैर आया
हाँ, सच, बहुत ही अच्छा अनुभव किया मैंने।

मूल नेपाली से अनुवाद : अर्जुन निराला