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इंतज़ार है / राजेन्द्र स्वर्णकार

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लिक्खा है ख़त आज अमावस ने पूरनमासी के नाम !
पूरनमासी , तुम्हें सलाम !
रात उजासी , तुम्हें सलाम !!

लाखों सदियां गुज़रीं ; ये आंखें मिलने को तरस गईं  !
कितने तूफ़ां आए ! कितनी घोर घटाएं बरस गईं  !!
लिए मिलन की प्यास - आस ,
करती यह प्यासी तुम्हें सलाम !
पूरनमासी , तुम्हें सलाम !!

बहन तुम्हारी मैं ; फ़िर भी क्यों भेद किया उस दाता ने ?
भला तुम्हारा , बुरा धराया मेरा नाम विमाता ने !!
पीड़ अभागी मेरे मन की ,
लिखे उदासी, तुम्हें सलाम !
पूरनमासी, तुम्हें सलाम !!

सौ सौ बार जुआ खेला, हर दांव में लेकिन हार मिली !
प्यार के बदले नफ़रत, श्रद्धा के बदले तक़रार मिली !!
लील रहा अस्तित्व …शोर, हा !
मौन का यह दु:खमय परिणाम ?
पूरनमासी, तुम्हें सलाम !!

आदम की संतान करे शैतानी ; और मुझ पर इल्ज़ाम ?
ले कर मेरी आड़, ज़माना पाप करे और मैं बदनाम  ?!
मैल पराये पापों का ;
हो देह क्यों मेरी स्याह तमाम ?
लिक्खा है ख़त आज अमावस ने पूरनमासी के नाम !!

बहन ! उजाले में , सच है सब लगे सुहाना और सुंदर !
पर… जब मेरा साथ मिले ; सब झांक सकें घट के अंदर !!
बुरी कहां मैं इतनी ,
जितने लगते हैं मुझ पर इल्ज़ाम ?
लिक्खा है ख़त आज अमावस ने पूरनमासी के नाम !!

कभी ज़माना बदलेगा ; इंसाफ़ मिलेगा तब शायद !
चिर - पीड़ित अपमानित मन को प्यार मिलेगा तब शायद !!
सच और झूठ में फ़र्क़ समझने वाले लेंगे जन्म कभी !
तेरा मेरा , काला गोरा ; मिट जाएंगे भेद सभी !!
इंतज़ार है… कब तुमसे मैं ,
कब मिलती है भोर से शाम ?!
लिक्खा है ख़त आज अमावस ने पूरनमासी के नाम !!