भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

इक अक्से-दिल-पज़ीर तहे-आब देखना / मेहर गेरा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

 
इक अक्से-दिल-पज़ीर तहे-आब देखना
मेरी सरिश्त में है कोई ख़्वाब देखना

इक अब्र-सा बरसना, किसी मर्गज़ार पर
और एक रेज़गार को सेराब देखना

नायाब ही समझना उसे हर लिहाज़ से
लेकिन उसी के शामो-सहर ख्वाब देखना

हर रोज़ ही उठाना, गये वक़्त की किताब
जिसमें हो तेरा ज़िक्र वही बाब देखना

दिन भर पहन के फिरना दरीदा लिबास ही
शब को बदन पे अतलसो-कमख्वाब देखना।