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इक तबस्सुम के लिए बारहा सोचा उसने / बलजीत सिंह मुन्तज़िर

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इक तबस्सुम[1] के लिए बारहा[2] सोचा उसने ।
फिर दिया भी तो महज़ फासला तन्हा उसने ।

लबे सागर[3] के किनारों पे तिशनगी[4] का दीया,
काश ! देखा हो मचलते हुए बहता उसने ।

कभी सीखा था घटाओं की रवानी[5] सुन कर,
अपने दिल का भी मुझे हाल सुनाना उसने ।

अपनी आँखों में समेटे हुए बदली की फ़ज़ा[6],
प्यासी धरती-सा मुझे एक पल देखा उसने ।

ज़र-ओ-ज़ेवर[7] की ही मानिन्द मेरे प्यार को भी,
इक दिलासे की तरह हिज्र[8] में पहना उसने ।

मेरी ग़ैरत को ही मग़रूरी[9] समझ कर शायद,
दिल में ठाना था मुझे 'मुंतज़िर’[10] रखना उसने ।।

शब्दार्थ
  1. मुस्कान
  2. बार-बार
  3. समन्दर के होंठ
  4. प्यास
  5. बहाव
  6. मौसम, वातावरण
  7. सोना, गहने
  8. जुदाई
  9. घमण्ड
  10. प्रतीक्षारत