भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

इक हिरण एक हिरणी, जंगल म्हं कलोल करैं थे / दयाचंद मायना

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

इक हिरण एक हिरणी, जंगल म्हं कलोल करैं थे
तीर मार दिया कारक नै, उसकी के खूद चरैं थे...टेक

तेरा जाइयो सत्यानाश शिकारी, न्यू हिरणी नै कही
समो सधी थी आज, बीज का मौका था सही
इस देह तै आगै और नइ्र, रचना की नीम धरै थे...

पति की मृत्यु देख हिरणी, राम ए राम पुकारी
मेरे की तरिया रोवैगी रे, पापी नर तेरी नारी
वो है क्यूकर मारा रे शिकारी, और भी मृग फरै थे...

दिल दरिया की झाल रुकै ना डोली और नाक्या तै
नींबू के दो भाग बणा दिए, रस टपकै पाक्या तै
रो-रो कै दोनूं आंख्या तै, टस-टस नीर झरै थे...

दानी साकोल गाम पोंहच, उड़ै मंगत गया दयाचन्द
आच्छी-आच्छी बातचीत रंग सिखण नया दयाचन्द
गुरु मुंशी की दया दयाचन्द, छनद का जोड़ भरै थे...