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इजाज़त मिल सकेगी क्या ? / निज़ार क़ब्बानी / फ़ीरोज़ अशऱफ

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इजाज़त मिल सकेगी क्या,
जहाँ सब सोचने और लिखनेवालों का मुक़द्दर
मौत का घर है,
जहाँ लब क़ैद हैं,
और दरवेशों ने जहाँ
ताज़ा लफ्ज़ पे पहरे बैठाए हैं,
जहाँ कुछ पूछने का मतलब है सज़ा पाना,
वहाँ मुझको इजाज़त मिल सकेगी क्या ?

इजाज़त मिल सकेगी, अपने बच्चों को
मैं पालूँ जिस तरह से पालना चाहूँ,
बता पाऊँ कि मज़हब आदमी और उसके रब के
आपसी रिश्ते को कहते हैं
कोई भी तीसरा मज़हब का ठेकेदार दरमियाँ आ नहीं सकता !

इजाज़त मिल सकेगी क्या
मैं पहले ये बता पाऊँ कि मज़हब नाम है
मिलने-मिलाने का, सचाई का,
कि मज़हब नाम है ईमानदारी का,
फिर उसके बाद जी चाहे तो यह सोचें
मुसतहब या पुण्य क्या है
वजू कैसे करें, नहाएँ कैसे,
दाहिने हाथ से लुकमा बनाएँ ।

इजाज़त मिल सकेगी क्या
कि अपनी बेटी को ये बतला दूँ
ख़ुदा को प्यार है उससे
वो जब चाहे, जहाँ चाहे, दुआ माँगे
ख़ुदा से इल्म माँगे, पुण्य को माँगे,
बस, उसकी ही रिज़ा माँगे ।

इजाज़त मिल सकेगी अपने बच्चों को
बड़े जब तक न हो जाएँ
क़ब्र से पाप के हर्गिज़ डराऊँ मैं नहीं तब तक
कि बच्चे मौत से पूरी तरह वाकिफ़ नहीं अब तक ।

इजाज़त मिल सकेगी क्या
कि अपनी प्यारी बेटी को
मैं अपनी सभ्यता से, संस्कृति से करा दूँ ठीक से वाकिफ़,
ये बेहतर है वो इनसानियत के दीन को दिल में बसाए
फिर जो चाहे तो सिर ढके, ज़ीनत छुपाए ।

इजाज़त मिल सकेगी, अपने बेटे को ये समझाऊँ
डाह या फिर जाति, या फिर मज़हब
आदमी को अपने रब से दूर करता है
किसी को दुख न दे और माफ़ भी कर दे
कि बस एहसान ही इनसान को पुरनूर करता है ।

इजाज़त मिल सकेगी, अपनी बेटी को बता पाऊँ
कि बस आयत को यूँ याद कर लेना नहीं काफ़ी,
जो वो स्कूल में पढ़ती है, वो सब भी ज़रूरी है
इल्म का, दीन का इक ख़ास रिश्ता है,
समझकर पढ़ने वालों से
ख़ुदा की ख़ास नज़दीकी हुआ करती !

अँग्रेज़ी से अनुवाद : फ़ीरोज़ अशऱफ