भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

इन्कलाब का दहका खाकै गोरी सत्ता मृत होगी / राजेश दलाल

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

इन्कलाब का दहका खाकै गोरी सत्ता मृत होगी
झुण्ड के झुण्ड जां जय जय करते लाहौर जेळ तीर्थ होगी
 
दसौं दिशा लहरागी लपटें भट्ठी होगी लाहौर मैं
भारत मां की लाडली माया कट्ठी होगी लाहौर मैं
क्रान्ति का जन्म होया फेर छट्ठी होगी लाहौर मैं
विकटोरिया के ताज की रे-रे मिट्टी होगी लाहौर मैं
पर भगत सिंह के विचारां कै तै बुलटप्रूफ परत होगी
 
आजादी की शादी मैं बाराती फिरैं क्रान्ति के
जादूगर ज्यूं डमरू बजा करतब करैं क्रान्ति के
धधकती लौ, मस्ताने पतंगे चिपट-मरैं क्रान्ति के
सामण-भादौ बूंदा की जगां अंगारे गिरैं क्रान्ति के
गहरी खाई गुलामी की इब सिर-धड़ से भरत होगी
 
मिलाइयो रै मनै मेरे भगत तै ताऊ चश्मे तार कह
कोयल बोली जब गाऊं तू चाल चलण नै त्यार कह
एक नन्हा मेंमना उछल पड़ा उनै म्हारी नमस्कार कह
ओये-होये रै हम गये काम तै स्वर्ग पड़े अवतार कह
जाऊंगी मै तै मूळ ना मानुं राजा-राणी मैं शरत होगी
 
रंग दे बसंती चौला ओये मां राष्ट्र-गाणा होता जा
जेल-अदालत, काळ-कोठडी ठेल-ठिकाणा होता जा
भूख हडताळी नाचैं कूदैं गजब का वाणा होता जा
आबो-हवा इसी फिरगी रळदू भी स्याणा होता जा
साम्राज्यवाद की बेड़े-बन्दी झेरै डूब गरत होगी
 
भगत सिंह के जिकर सुणे तै होजां सै अरमान खड़े
क्रान्ति के अर्थ बता वो करग्या सबके ध्यान खड़े
राजेश कह या के बणैगी खुद मौत के होगे कान खड़े
वायस-राय नै थाळी मैं भी दीखै हिन्द जवान खड़े
यो नजारा नजर बसा ल्यो ना तै फांसी भी अनर्थ होगी