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इश्क़ में जिसकूँ महारत ख़ूब है / वली दक्कनी

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इश्‍क़ में जिसकूँ महारत ख़ूब है
मश्रब-ए-मजनूँ तरफ़ मंसूब है

आशिक़-ए-बेताब सूँ तर्ज़-ए-वफ़ा
ज्‍यूँ अदा मेहबूब की मेहबूब है

इश्‍क़ के मुफ़्ती ने यो फ़त्‍वा दिया
देखना ख़ूबाँ का दर्स-ए-ख़ूब है

लख़्त-ए-दिल पे ख़त लिखा हूँ यार कूँ
दाग़-ए-दिल मुहर-ए-सर-ए-मक्‍तूब है

ग़म्‍ज़-ओ-नाज-ओ-अदा-ए-नाज़नीं
ज़ुल्‍म है, तूफ़ान है, आशोब है

लिख दिया यूसुफ़ ग़ुलामी ख़त तुझे
गरचे नूर-ए-दीदए-याक़ूब है

हर घड़ी पढ़ता है अशआर-ए-'वली'
जिसकूँ हर्फ़-ए-आशिक़ी मर्ग़ूब है