भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

इस थरे बजार म्हं एक बै उसने बुलवा दियो / मेहर सिंह

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

यो दुःख मालिक नैं गेर्या जगदेव पति सै मेरा
इस थरे बजार म्हं एक बै उसने बुलवा दियो।टेक

सिर पै चढ़ी घड़ी जुर्म की
आज फूटगी बात मर्म की
मैं घणी कर्म की माड़ी
जब द्यूंगी खोल किवाड़ी
बिन भरतार मैं, म्हारी चार आंख मिलवा दियो।

अधर्म कर रहा था बेईमान
बिगाड़ै था पतिभ्रता की शान
मैं खो द्यूं ज्यान टकासी
ना लाऊं देर जरा सी
ले रही तलवार मैं इसनै म्यांन मैं घलवा दियो।

मैं कह रही सूं जोड़ कै हाथ
थारी आड़ै बैठी सै पंचायत
एक बात कहूंगी न्याय की
मेरै ना देही म्हं बाकी
हो रही लाचार मैं सत नरजे पै तुलवा दियो।

म्हारे छूट गये रंग ठाठ
घर कुणबा हुअया बारा बाट
मेहरसिंह जाट कड़ै हस्ती सै
मेरी टूटी सी किस्ती सै
डौ लै मझदार म्हं या चल जा तो चलवा दियों।