भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

इस बार का कोलकाता / तसलीमा नसरीन

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

इस बार कोलकाता ने मुझे बहुत कुछ दिया
दुत्कार, छिः छिः
निषेधाज्ञा, कलंक और जूते।

लेकिन कोलकाता ने चुपके-चुपके मुझे कुछ और भी दिया है
जयिता की आँसू भरी दो आँखें
ऋता पारमिता की मुग्धता
बिराटी का एक विराट आकाश दिया है
2, रवीन्द्र पथ वाले मकान का खुला बरामदा
वह आकाश नहीं तो और क्या है!

कोलकाता ने मेरी सुबहों को लाल गुलाबों से भर दिया है
मेरी तमाम शामों की वेणियाँ खोल कर बिखरा दी है हवा में
आलता ने मेरी शामों की ठुड्डी को छुआ है
इस बार के कोलकाता ने मुझे बहुत प्यार किया
सबको दिखा-दिखा कर चार दिन में चार करोड़ बार चूमा है उसने!
बीच-बीच में कोलकाता बिलकुल माँ की तरह होता है
प्यार करता है लेकिन कहता नहीं कि ‘करता है’, ... बस करता रहता है।

प्यार करता है शायद इसीलिए मैं
कोलकाता-कोलकाता करती रहती हूँ!
यदि न भी करे, दुर्-दुर् करके अगर दुत्कार भी दे
कोलकाता का आँचल थामे मैं बेअदबों की मानिन्द खड़ी ही रहूँगी
यदि धकेल कर वह हटाना भी चाहे
चाहे जो हो जाए
एक क़दम भी नहीं हटूँगी मैं
प्यार करना क्या सिर्फ़ उसे ही आता है, मुझे नहीं?

मूल बांग्ला से अनुवाद : उत्पल बैनर्जी