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इस भीड़ में वो याद पुरानी भी कहीं है / रवि सिन्हा

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इस भीड़ में वो याद पुरानी भी कहीं है
दाइम[1] दहर[2] में लम्हा-ए-फ़ानी[3] भी कहीं है

शुरुआत की लपटें हैं अभी तेज़ उठेंगीं
फिर देखना इस आग में पानी भी कहीं है

इस बुत में नुमूदार[4] तो है हुस्ने-तसव्वुर[5]
पत्थर पे तशद्दुद[6] की निशानी भी कहीं है

कच्ची सी तिरी धूप में पिघले के न पिघले
गो बर्फ़ में दरिया की रवानी भी कहीं है

तरतीबे-अनासिर[7] में तसव्वुर का उभरना
शोरिश[8] में मशीनों के म'आनी[9] भी कहीं है

नाकाम रहा या के हुआ ग़र्क़े[10]-तग़ाफ़ुल[11]
दरिया-ए-अबद[12] मेरी कहानी भी कहीं है

ख़ुरशीद[13] कभी थे तो सहर[14] फिर से करेंगें
तारों को मगर रात बितानी भी कहीं है

शब्दार्थ
  1. चिरन्तन (eternal)
  2. काल, युग (time, era)
  3. क्षणभंगुर (momentary)
  4. प्रकट (to appear)
  5. कल्पना (imagination)
  6. हिंसा (violence)
  7. पंचतत्व (elements)
  8. उपद्रव (disorder, chaos)
  9. अर्थ (meaning)
  10. डूबा हुआ (drowned)
  11. उपेक्षा (indifference, neglect)
  12. समय की अनन्त नदी (the river of infinite time)
  13. सूरज (the sun)
  14. सुबह (morning)