भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

उठ सुबह अखबार पढूं, मैने चक्कर सा आवै सै / जय सिंह खानक

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

उठ सुबह अखबार पढूं, मैने चक्कर सा आवै सै
अपराध जगत का भर्या पड़्या ना कोए सही खबर पावै सै
 
लूट-खसूट मची दुनिया मैं, यें आपस मै गळ काटैं
भाई-भाई कटके मर रहे, ये मेल करण तै नाटैं
बाबु बेटा देवैं गवाही, होटल मैं पत्ते चाटैं
ये ईज्जत खातर सिर काटैं, या रोज खबर पावै सै
 
फ्रैंट पेज पै ये बड़े घोटाला, ये रोज छपे पावैं सै
पांच-सात दिन रह रोला, फिर एकदम छिप जावैं सै
सी.बी.आई. न छापे मारे, या रोज सुणी जावैं सै
एकदम फाईल गुम होजा, ना ढुंढा तै पावैं सै
या बेराना कडै़ जावै सै, ना बात समझ आवै सै
 
नेता और अभिनेता नै, या लूट मचा राखी सै
इाम आदमी ना समझै, इसी चाल चला राखी सै
नियम-कानून उड़े सारे, इसी हवा चला राखी सै
अखबार बणे साथी उनके, इसी रीत चला राखी सै
ना छोड़ कसर राखी सै, देश यो कित जांणा चाहवै सै
 
दंगां मै घणें लोग मरैं, जब इन्हें बड़ी खबर पावैं सै
10-20 मरै लाठी-चार्ज मैं, जब इन्हें बड़ी खबर पावैं सै
तंगी मै करैं कुणबा घाणी, ये रोज छपी पावै सैं
ना मिलै दहेज तो हत्या करदें, ये खबर छपी पावैं सै
ये इसी खबर क्ंयूँ लावै सै, क्यूँ जनता नै बहकांवैं सै
 
जो छपणी थी वा नहीं छपी, ना छपणी थी वा छपगी
इन बेहुदी खबरां नै सुण-सुण, या जनता सारी छकगी
अपहरण चौरी, डाकां की तो, ये सारी खबरें छपगी
जनता के मुद्दे नहीं छपे, या कह-कह दुनियाँ खपगी
कहै मा.जयसिंह ये पत्रकार भी, ना सही खबर लावै सै