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उदास दिन / केदारनाथ अग्रवाल

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वह उदास दिन

पेंसन पाए चपरासी-सा,

और जुए में हारे जन-सा,

आपे में खोए गदहे-सा,

मौन खड़ा है ।
रवि रोता है

माँ से बिछुड़े हुए पुत्र-सा ।

धूप पड़ी है

परित्यक्त पत्नी-सी कातर ।

पाँव कटाए

हवा लढ़ी पर लेटे-लेटे,

धीरे-धीरे

अस्पताल की ओर चली है,

सुबुक रही है !

एक टांग पर खड़े,

देह का भार उठाए,

ऊँचे-ऊँचे पेड़ पुरातन

वनस्थली में तप करते हैं

जटा बढ़ाए ।