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उन क्षितिजों के पार / महेंद्रसिंह जाडेजा

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अँधेरे के पीछे से मैं जागता हूँ ।
मुझे सुनाई देती है मृत्यु की हँसी

कान भर देती है हँसी
और दूर
उन क्षितिजों के पार रहने वाला
ईश्वर चल पड़ता है
मेरी तरफ़ पीठ फेरकर,

मुझे उसके क़दमों की आवाज़
सुनाई देती है ।

अंधेरे का सूरज
उगलता है काला-काला अँधेरा
और उसमें बहुत-सी चीजें
हो जाती हैं अदृश्य

खूँटी पर लटकते मेरे कपड़े,
एक हाथ टूटी कुर्सी,
मेरी पत्नी का फो़टो,
मकड़ी का जाला,
जूतों का एक जोड़ा ।

आईना,
प्लास्टिक के फूलों वाला गुलदान,
ज़मीन पर बिखरे हुए धूल के कण,
आदमी के पसीने से गंधाती
उनके दबाव से कुचली जाती
भरपूर गंदी गलियों का वातावरण,

मेरे माथे के सफ़ेद बाल
और पड़ोस में रहते
बूढ़े को लगातार आती खाँसी...

मेरी आंखों की पुतलियों में
इंजन की तरह सीटियाँ बजाता
अँधेरा दौड़ रहा है...


मूल गुजराती भाषा से अनुवाद : क्रान्ति