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उम्मीद भी किरदार पे पूरी नहीं उतरी / मुनव्वर राना

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उम्मीद भी किरदार पे पूरी नहीं उतरी
ये शब [1]दिले-बीमार पे पूरी नहीं उतरी

क्या ख़ौफ़ [2]का मंज़र[3]था तेरे शहर में कल रात
सच्चाई भी अख़बार में पूरी नहीं उतरी

तस्वीर में एक रंग अभी छूट रहा है
शोख़ी अभी रुख़सार[4]पे पूरी नहीं उतरी

पर[5]उसके कहीं,जिस्म कहीं, ख़ुद वो कहीं है
चिड़िया कभी मीनार पे पूरी नहीं उतरी

एक तेरे न रहने से बदल जाता है सब कुछ
कल धूप भी दीवार पे पूरी नहीं उतरी

मैं दुनिया के मेयार [6]पे पूरा नहीं उतरा
दुनिया मेरे मेयार पे पूरी नहीं उतरी

शब्दार्थ
  1. रात
  2. भय
  3. दृश्य
  4. गाल
  5. पंख
  6. मानक, मानदण्ड