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उस दुनिया की सैर के बाद (शीर्षक-कविता) / सांवर दइया

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जानता हूं उन्हें अच्छी तरह
कल नहीं थे वे ऐसे
हो गए हैं जैसे आज

वे रंगों की व्याख्याएं
और शब्दों की सीमाएं
जानते थे
काले और हरे रंग का अर्थ
एक ही नहीं मानते थे !

एक ही वर्ण से शुरु होने वाले
अनेक शब्द उन्हें याद थे
क से शुरू करते
कविता-कहानी-कथोपकथन
क की कैंची से
कतर-बैंत करते कच्ची-पक्की बात
क की कचहरी में ला खड़ी करते
कच्ची कली
या कचनार
कच्ची बस्ती, कहवाघर, कहकशां
कमल-नयनी कंचन-कामनी के कुच
क से बताया करते थे
पता नहीं क्या कुछ !
(कमीना / कमजात / कमजर्फ भी)
क से ही किया करते थे
पर्दाफाश
सफेदपोशों की काली करतूतों का !

लेकिन
जब से वे लौटे है
‘उस दुनिया’ की सैर करके
पता नहीं क्या हो गया है उन्हें
कि उनकी बात सुनकर
बात पूछने वाला रोता है
जब वे कहते हैं-
क से सिर्फ क होता है !