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ऋषि-मुनियो नै सत्य सहार, वनखोड़ का मथन किया / ललित कुमार

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श्री लख्मीचंद प्रश्नावली व ललित कुमार उतरावली रचना-

प्र. - आधी रात शिखर तैं ढलगी, होया पहर का तड़का,
       बिना जीव की कामनी कै, होया अचानक लड़का ।। टेक ।।

उ. - ऋषि-मुनियो नै सत्य सहार, वनखोड का मथन किया,
       बिना जिव की काया से, फैर पृथु जी नै जन्म लिया ।। टेक ।।

प्र. - जब लड़के का जन्म होया, ये तीन लोक थर्राये,
       ब्रह्मा-विष्णु-शिवजी तीनू, दर्शन करणे आये,
       सप्त ऋषि भी आसन ठा कै हवन करण नै आये,
       साढसती और मन मोहनी नै, आके मंगल गाये,
       जब नाम सुण्या था उस लड़के का, होया काल बली कै धड़का ।।

उ. - जब पृथु का जन्म होया, तीन लोक मै मांच्या शोर,
       ब्रह्मा-विष्णु-शिवजी आऐ, घन मै घटा तणी घनघोर,
       सप्त ऋषियों नै हवन किया, पृथु का बढिया जोर,
       उस साढ़सति नै मंगल गाऐ, नाचे किन्नर-गंधर्व और,
       वो काल बली भी घबराया था, जब विष्णु नै सुदर्शन दिया ।।

प्र. - सात समुन्द्र उस लड़के नै, दो टैम नुहाया करते,
       अग्न देवता बणा रसोई, भोग लगाया करते,
       इंद्र देवता लोटा लेकै, चलू भी कराया करते,
       पवन देवता पवन चला, लड़के ने सुवाया करते,
       जब लड़के नै भूख लगी, वो पेड़ निगलग्या बड़ का ।।

उ. - थे सात समुद्र शरण पृथु की, आज्यां रोज नुहाणे नै,
       अग्नि देव नै करी रसोई, दिया सदृढ धनुष चलाणे नै,
       इन्द्र देव नै मुकुट दे दिया, देई बर्षा चलू कराणे नै,
       पवन देव नै वरदान दिया, मै आज्याऊ रोज सुवाणे नै,
       जब पृथु नै भूख लगी थी, उन्है बड़का-ऐ दुध पिया ।।

प्र. - कामदेव पहरे पै रहता, चारों युग थे साथी,
       अष्ट वसु और ग्यारा रूद्र, ये लड़के के नाती,
       बावन कल्वे छप्पन भैरु, गावें गीत प्रभाती,
       उसके दरवाजे के ऊपर, बेमाता साज बजाती,
       गाणा गावै साज बजावै, करै प्रेम का छिड़का ।।

उ. - विष्णु का अवतार था पृथु, न्यु काम-युग बणे साथी,
       विष्णु के कारण वसु-रूद्र, कहलाऐ पृथु के नाती,
       बावन कलवे छप्पन भैरूं, सिद्ध गांवै गीत प्रभाती,
       वैकुंठ सा लगै नजारा, बेमाता भी साज बजाती,
       इतणा बढिया साज बजाया, लाग्या सबका जीया ।।

प्र. - सब लड़कों मै उस लड़के का, आदरमान निराला,
       गंगा-जमना अड़सठ तीर्थ, रटै प्रेम की माला,
       चाँद-सूरज और तारे तक भी, देरे थे उजियाला,
       वेद धर्म की बात सुणावै, लख्मीचंद जांटी आळा,
       उसनै कवी मै मानूं, जो भेद खोलदे जड़ का ।।

उ. - सब दुनियां से पृथु जी का, था दरबार न्यारा,
       गगां-जमना 68 तीर्थ, कहै भार तारीये म्हारा,
       तारेगंण चंद्रमां चंमकै, संग चमकै सुर्य बारा,
       ललित बुवाणी आले नै यो, भेद खोल दिया सारा,
       ये कवियां के घर दूर बताऐ, मेरा न्यु लरजै सै हिया ।।