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एक आदमी / सुरेश सलिल

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स्व० जवाहर चौधरी[1] की याद

एक आदमी, आदम को जिस पे' गुमान हो
तुम्हें ध्यान हो कि न ध्यान हो
था अभी कल तक हमारे दरमियान
...और आज ही आप उसे भूल गए ?
याने कि फुज़ूल गए वो सारे ज़ज्बात
जो एक सच्चे कामरेड के होते हैं !

उसका कुछ सरमाया पुराना पार्टी-कार्ड था
             (जो लौटाया नहीं गया था)
इप्टा से जुड़ी यादें थीं
ज़िन्दादिल दोस्त थे अगले ज़मानों के
अदीब थे, जिनकी किताबें शाये करने को
पहले 'अक्षर', फिर 'शब्दकार' में ढला था वो
घर बनाने में उसका कभी यक़ीन नहीं रहा
तुर्कमान गेट दिल्ली की गली डकौतान
                     पहले उसका पता रहा
फिर पुल पार की किसी नामालूम-सी बस्ती में
ग्यारहसाला फाजिल के साथ लापता रहा
दोस्तों की झलक भर पाने को छटपटाता हुआ
गाता हुआ आख़िरी साँस तक
भव-स्वतंत्रता का गान ।
०००
दिल ही दिल था वो
दास्तानों के जैसा किरदार,
जवाहर चौधरी था
दास्तांनुमा दिलदार....

शब्दार्थ
  1. एक ज़माने के पूर्णकालिक कम्युनिस्ट सदस्य, 1952 के दशक में दिल्ली 'इप्टा' के स्तम्भों से एक, 'अक्षर' और 'शब्दकार' प्रकाशनों के परिकल्पक।