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एक इक जिस की अदा हम को भी हरजाई लगे / शीन काफ़ निज़ाम

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एक इक जिस की अदा हम को भी हरजाई लगे
लेकिन उस को चाहते रहने में दानाई लगे

ख़ाक सी उड़ती हुई आँखों में चेहरा ज़र्द है
शहर का हर शख़्स अब उस का ही सौदाई लगे

इन दरो दीवार को जैसे कभी देखा न था
अजनबी क्यूँ इतनी अपने घर की अंगनाई लगे

जिस तरह चटखे बदन रह-रह के कोई नाज़ से
वैसे ही आँसू मुझे यादों की अंगड़ाई लगे

हर गली कूचे में चर्चा अब हमारे क़ुर्ब का
नाम लगता है उसे और मुझ को रुसवाई लगे

फिर हुई पत्ते की खड़कन फिर कहीं पंछी उड़ा
याद कोई फिर मिरे दरवाज़े तक आई लगे

बस सराबों की समाहत के सिवा कुछ भी नहीं
दूर से जिन आँखों में झीलों सी गहराई लगे