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एक जादुई पल / अलेक्सान्दर पूश्किन

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वो एक जादुई पल
ज्यों का त्यों आँखों में आज भी
तुम मेरे साथ, तुम मेरे सामने...
माना आज धुँधला और अस्पष्ट
पर मेरे लिए तो
अति सुन्दर, अति दुर्लभ
इन दूरियों और वर्जनाओं से
विनती करता हूँ रहम खाओ मुझपर
युग बीते तुम्हारी सींचती आवाज़ सुने
युग बीते तुम्हें सपने तक में आए
युग बीते जब क्रूर वक़्त के हाथों
छिन गई थीं तुम मुझसे
तुम जो मेरा एकान्त, मेरी साधना हो !
धुँधली पड़ती जा रही हैं
तुम्हारी मधुर आवाज़ की सरगम
अलौकिक नाकनक्श,
इन सूने उदास, अलस पलों में
खोया रहता हूँ मैं
काले उमड़ते बादलों में
कोई कल्पना नहीं, प्रेरणा नहीं
न कोई रोने, मचलने या प्यार करने को
न कोई बहाना जीने को...
दुख में डूबी पलकें
पुनः देखतीं उमड़ते बादल को
और तब अचानक
फिर वही जादुई पल आ जाता है
तुम मेरे सामने
तुम मेरे साथ...
अति सुन्दर, अति दुर्लभ !!

अँग्रेज़ी से अनुवाद : शैल अग्रवाल