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एक पाग़ल औरत की चिट्ठी / निज़ार क़ब्बानी

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1.

मेरे आक़ा !
यह एक पाग़ल औरत की ओर से लिखी गई चिट्ठी है
क्या मुझसे पहले भी किसी पाग़ल औरत ने आपको ख़त लिखा है ?
मेरा नाम ? छोड़िए, नामों को किनारे करते हैं
रनिया या ज़ैनब
या हिन्द या हायफ़ा
मेरे आक़ा ! जो सबसे बेहूदा चीज़ हम अपने साथ लिए फिरते हैं --
वो यह नाम ही तो हैं

2.

मेरे आका !
मैं खौफ़ खाती हूँ अपने मन की बात आपसे कहने में
मुझे खौफ़ है -- गर मैंने कहा तो आग लग जाएगी जन्नतों में
क्योंकि मेरे आका ! पूरब के इस हिस्से में
ज़ब्त कर ली जाती हैं नीली चिट्ठियाँ
ज़ब्त कर लिए जाते हैं सपने औरतों के सीने में संजोए
कुचल दिया जाता है यहाँ औरतों के जज़्बात को
यहाँ चाकुओं और छुरों
की ज़बान में बात की जाती है
औरतों से
यहाँ क़त्ल कर दिया जाता है
वसन्त का, प्रेम का और काली गुँथी चोटियों का
और पूरब के इस हिस्से में मेरे आका
उन्हीं औरतों के सर की हड्डियों से
बनाया जाता है पूरब का हसीन ताज़

3.

मेरे आक़ा !
मेरी खराब लिखावट देखकर नाराज़ न हों
क्योंकि इधर मैं आपको ये ख़त लिख रही हूँ
और उधर मेरे दरवाज़े के पीछे लटक रही है श्मशीर
इस कमरे के बाहर हवा की सरसराहट और कुत्तों की आवाज़ों की गूँज है
मेरे आक़ा !
अन्तर अल अब्स मेरे दरवाज़े के पीछे खड़ा है !
गर उसने ये ख़त देख लिया तो
कसाई की मानिन्द वह मेरे टुकड़े कर डालेगा
वो मेरा सर क़लम कर देगा
गर मैंने अपनी यातनाओं के बारे में कुछ कहा तो
गर उसने देख लिए मेरे झीने कपड़े
तो धड़ से अलग कर देगा वो मेरा सर
क्योंकि मेरे आक़ा ! पूरब के इस हिस्से में,
औरतें घिरी रहती हैं भालों की नोंक से
और मेरे आक़ा ! तुम्हारा पूरब
मर्दों को तो पैगम्बर बना देता है
और औरतों को दफ़ना देता है धूल में

4.

नाराज़ न होइएगा, मेरे आक़ा !
इन सफ़ों को पढ़कर
नाराज़ न होइएगा, मेरे आक़ा !
अगर सदियों से बन्द शिकायतों को मैं तहस-नहस कर दूँ
गर मैं बाहर आ जाऊँ अपनी बेहोशी से
गर मैं भाग जाऊँ...
किले के हरम में बने गुम्बदों से
गर मैं बग़ावत कर दूँ अपनी मौत के ख़िलाफ़...
अपनी क़ब्र, अपनी जड़ों के ख़िलाफ़...
और उस विकराल कसाईखाने के ख़िलाफ़...

नाराज़ न होइएगा मेरे आक़ा !
अगर मैं आपसे कह देती हूँ अपने दिल की बातें
क्योंकि पूरब में बसने वाले आदमी
का कोई सरोकार नहीं नज़्म और जज़्बात से
गुस्ताख़ी माफ़ मेरा आक़ा ! पूरब का आदमी
कुछ नहीं समझता औरत को
बिस्तर से परे

5.

मुझे माफ़ करिए मेरे आक़ा !
गर मैंने मर्दों के साम्राज्य पर हमले की गुस्ताख़ी की है
क्योंकि पूरब का महान अदब
वास्तव में सिर्फ मर्दों का अदब है
और यहाँ प्रेम हमेशा से
मर्दों के हिस्से में ही आया है
यहाँ कामवासना एक दवा की तरह
सिर्फ मर्दों को ही बेची जाती हैं

हमारे देश में औरतों की आज़ादी का ख़याल
एक बेवकूफ़ाना परीकथा जैसा है
क्योंकि इस देश में
मर्दों की आज़ादी से इतर
कोई आज़ादी नहीं होती

मेरे आक़ा !
मुझे फ़र्क नहीं पड़ता, जो भी आपके जी में आए, आप कह लें मुझे:
कि मैं ओछी हूँ.. पाग़ल हूँ.. सनकी हूँ.. कम अक़्ल हूँ..
मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगेगा..
क्योंकि जो भी औरत लिखती है अपने सरोकारों की बात
उसे मर्दों का तर्क
पाग़ल औरत ही मानता है
और क्या मैंने शुरूआत में ही आपसे नहीं कह दिया
कि मैं एक पाग़ल औरत हूँ ?

अँग्रेज़ी से अनुवाद : भावना मिश्र