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एक प्रार्थना / महमूद दरवेश

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जिस दिन मेरे शब्द
धरती थे ...
मैं दोस्त था गेहूँ की बालियों का ।

जिस दिन मेरे शब्द
क्रोध थे
मैं दोस्त था बेड़ियों का ।

जिस दिन मेरे शब्द
पत्थर थे
मैं दोस्त था धाराओं का,

जिस दिन मेरे शब्द
एक क्रान्ति थे
मैं दोस्त था भूकम्पों का ।

जिस दिन मेरे शब्द
कड़वे सेब थे
मैं दोस्त था एक आशावादी का ।

लेकिन जिस दिन मेरे शब्द
शहद में बदले ...
मधुमक्खियों ने ढँक लिया
मेरे होठों को! ...


अनुवाद : अशोक पाण्डे