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एक बार फिर अमरीका वही अमरीका बने / लैंग्स्टन ह्यूज़

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मुखपृष्ठ  » रचनाकारों की सूची  » रचनाकार: लैंग्स्टन ह्यूज़  » संग्रह: आँखें दुनिया की तरफ़ देखती हैं
»  एक बार फिर अमरीका वही अमरीका बने

एक बार फिर अमरीका वही अमरीका बने
वही एक सपना जो वह हुआ करता था
नयी दुनिया का अगुवा
एक ठिकाना खोजता
जहाँ ख़ुद भी आज़ादी से रह सके
अमरीका मेरे लिए कभी यह अमरीका रहा ही नहीं
एक बार फिर अमरीका उन स्वप्नदर्शियों का वही सपना बने
प्यार और मोहब्बत की वही ठोस महान धरती
जहाँ राजा कभी पैदा हुआ ही नहीं
और न आतंककारियों की यह साजिश
कि किसी एक के शासन में दूसरा प्रताड़ित हो
‘यह कभी मेरे लिए अमरीका रहा ही नहीं’

जी हाँ, मेरी यह धरती ऐसी धरती बने
जहाँ आज़ादी सम्मानित न हो
झूठी देशभक्ति की मालाओं से
जहाँ सबको अवसर मिले
और जीवन मुक्त हो
और जिस हवा में हम साँस लेते हैं
वह सबके लिए एक-सी बहे

’आज़ाद लोगों की इस धरती’ पर
कभी आज़ादी या बराबरी मुझे नसीब नहीं हुई
बतलाइए तो, कौन हैं आप इस अँधेरे में छिपते हुए
और कौन हैं आप सितारों से चेहरा छुपाते हुए

मैं एक गरीब गोरा आदमी हूँ अलगाया हुआ
मैं एक नीग्रो हूँ गुलामी का घाव खाया हुआ
मैं एक लाल आदमी हूँ अपनी ही धरती से
भगाया हुआ
मैं एक प्रवासी हूँ अपनी उम्मीदों की डोर से
बँधा हुआ
और हमें वही पुराना रास्ता मिलता है बेवकूफ़ी का
कि कुत्ता कुत्ते को खाए, कमज़ोर को मज़बूत दबाए

मैं ही वह नौजवान हूँ
ताकत और उम्मीदों से लबरेज़
जकड़ा हुआ उन्हीं पुरानी ज़ंजीरों से
मुनाफ़े की, सत्ता की, स्वार्थ की, ज़मीन हथियाने की
सोना लूट लेने की
ज़रूरतें पूरी करने के उपायों को हड़पने की
काम कराने की और मज़दूरी मार जाने की
अपने लालच के लिए सबका मालिक बनने की
ख़्वाहिशों की

मैं ही वह किसान हूँ ज़मीन का गुलाम
मैं वह मज़दूर हूँ मशीन के हाथ बिका हुआ
मैं ही वह नीग्रो हूँ आप सबका नौकर
मैं ही जनता हूँ विनम्र, भूखी, निम्नस्तरीय
उस सपने के बावजूद आज भी भूखी
ओ नेताओ! आज भी प्रताड़ित
मैं ही वह आदमी हूँ जो कभी बढ़ ही नहीं पाया
सबसे गरीब मज़दूर जिसे वर्षों से भुनाया जाता रहा है
फिर भी मैं ही वह हूँ जो देखता रहा
वही पुराना सपना
पुरानी दुनिया का जब बादशाहों का गुलाम था
और देखा करता था इतना मज़बूत, इतना बहादुर
और इतना सच्चा सपना
जो आज भी अपने उसी दुस्साहस के साथ
गीत बनकर गूँजता है
हर एक ईंट में, पत्थर में
और हर एक हल के फाल में
जिसने अमेरिका की ज़मीन को ऐसा बना दिया है
जैसी आज वह है
सुनो, मैं ही वह आदमी हूँ
जिसने उस शुरुआती दौर में समुद्रों को पार किया था
अपने होने वाली रिहाइश की खोज में
क्योंकि मैं ही वह हूँ
जिसने आयरलैण्ड के अँधेरे तटों को छोड़ा था
और पोलैण्ड की समतल भूमि को
और इंग्लैण्ड के चरागाहों को
और काले अफ्रीका के समुद्री किनारों से बिछुड़ा था
’एक आज़ाद दुनिया’ बनाने के लिए

आज़ाद?
किसने कहा आज़ाद?
मैं तो नहीं
जी हाँ, मैं तो नहीं
वे लाखों लोग भी नहीं
जो आज भी भीख पर जीते हैं
वे लाखों हड़ताली भी नहीं
जिन्हें गोली मार दी गयी
वे लाखों लोग भी नहीं
जिनके पास कुछ भी नहीं है
हमें देने के लिए

क्योंकि सारे सपने हमने मिलकर देखे थे
और सारे गीत हमने मिलकर गाए थे
और सारी उम्मीदें हमने मिलकर सजायी थीं
और सारे झण्डे हमने मिलकर फहराए थे
और लाखों लोग हैं
जिनके पास कुछ भी नहीं है आज
सिवा उस सपने के जो अब लगभग मर चुका है

एक बार फिर अमरीका वही अमरीका बने
जो कि वह अब तक नहीं बन पाया है
और जो कि उसे बनना ही है
एक ऐसी धरती जहाँ हर कोई आज़ाद हो
जो हमारी धरती हो, एक गरीब आदमी की
रेड इण्डियन की, नीग्रो की, मेरी
अमरीका को किसने बनवाया
किसके ख़ून-पसीने ने
किसके विश्वास और दर्द ने
किसके हाथों ने कारख़ानों में
किसके हल ने बरसात में
हमारे उस मज़बूत सपने को
फिर से जगाना होगा
चाहे जैसी भी गाली दो मुझे
ठीक है तुम चाहे जिस गन्दे नाम से मुझे पुकारो
आज़ादी का वह महान इस्पात झुकता नहीं है उनसे
जो लोगों की जिन्दगी में
जोंक की तरह चिपके रहते हैं
हमें अपनी धरती वापस लेनी ही होगी

अमरीका
जी हाँ मैं दो टूक बात करता हूँ
अमरीका कभी मेरे लिए यह अमरीका रहा ही नहीं
फिर भी मैं कसम खाता हूँ, वह होगा
गिरोहों की लड़ाइयों में हमारी मौत के बावजूद
बलात्कार, घूसख़ोरी, लूट और झूठ के बावजूद
हम लोग, हम सारे लोग
मुक्त करेंगे इस धरती को
इन खदानों को, इन वनस्पतियों को
नदियों को, पहाड़ों और असीम समतल भूमि को
सबको, इन महान हरित प्रदेशों के सम्पूर्ण विस्तार को
और फिर बनाएगे अमरीका को अमरीका।

मूल अंग्रेज़ी से अनुवाद : राम कृष्ण पाण्डेय