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एक माँ की प्रार्थना / लीना मल्होत्रा

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प्यार होगा तो दर्द भी होगा
सफ़र होगा
तो होंगी रुकावटें भी
साथी होगा तो यादें होंगी
कुछ मधुर तो कुछ कड़वी बाते भी होंगी
उड़ान होगी तो थकान होगी
सपने होंगे तो सच से दूरियाँ होंगी;

मेरी बेटी
तुम्हारे नए सफ़र की शुरुआत में
क्या शिक्षा दूँ तुम्हें --

प्यार मत करना - दर्द मिलेगा,
सफ़र मत करना - काँटे होंगे,
साथी मत चुनना - कड़वी यादें दुख देंगी
उड़ान मत भरना - थक जाओगी
इस दर्द से काँटो से आसुओं से भीगे रास्ते मत चुनना ,
मेरे ये डर कहीं तुम्हारे संकल्प को छोटा न कर दें
इसलिए
प्रार्थना में मैंने आखें मूँद ली है
और उन तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का आह्वान किया है -

हे बाधाओं के देवता !
मैं तुम्हे बता दूँ
कि वह बहुत से खेल इसलिए नहीं खेलती कि हारने से डरती है
तुम ध्यान रखना कि
कोई बाधा इतनी बड़ी न हो
जो उसके जीतने के हौसले को पस्त कर दे
तुम उसे सिर्फ़ इतनी ही मुसीबतें देना
जिन्हें पार करके
वह विजयी महसूस करे
और
उसकी यह उपलब्धि
उसके सफ़र में एक नया उत्साह भर दे ।

हे सपनों के देवता -
वह बहुत महंगे सपने देखती है
उसके सपनो में तुम सच्चाई का रंग
भरते रहना
ताकि
जब वह अपने सपनों की नींद से जगे तो
सच उसे सपने जैसा ही लगे ।

हे सच्चाई के देवता !
हर सच का कड़वा होना ज़रूरी नहीं है
इसलिए मेरी प्रार्थना स्वीकार करना
उसके जीवन के सच में
कड़वाहट मत घोलना ।

हे प्रेम के देवता !
मै तुम्हें आगाह कर दूँ
कि
वह तुम्हारे साधारण साधकों कि तरह नहीं है
जो लफ़्ज़ों के आदान-प्रदान के प्रेम से संतुष्ट हो जाए
वह असाधारण प्रतिभाओं की स्वामिनी है
वह जिसे चाहेगी टूट कर चाहेगी;
और समय का मापदंड उसके प्रेम की कसौटी कभी नहीं हो सकता
पल दो पल में
वह पूरी उम्र जीने की क्षमता रखती है
और
चार क़दम का साथ काफ़ी है
उसकी तमाम उम्र के सफ़र के लिए;
इसलिए
उसके लिए
अपने लोक के
सबसे असाधारण प्रेमी को बचा कर रखना
जो लफ़्ज़ों में नहीं
बल्कि अपनी नज़रों से लग्न-मन्त्र कहने की क्षमता रखता हो
और
जो उसके टूट के चाहने के लायक हो;

हे जल के स्वामी !
उसके भीतर एक विरहिणी छिपी सो रही है
जब रिक्तता उसके जीवन को घेर ले
और
वह अभिशप्त प्रेमी जिसे उसे धोखा देने का श्राप मिला है
जब उसे अकेला छोड़ दे
उस घड़ी
तुम अपने जल का सारा प्रवाह मोड़ लेना
वर्ना तुम्हारा क्षीर सागर
उसके आँसुओं में बह जाएगा
और तुम खाली पड़े रहोगे -
बाद में मत कहना कि मैंने तुम्हे बताया नहीं

हे दंड के अधिपति !
तुम्हें शायद
कई-कई बार
उसके लिए निर्णय लेना पड़े I
क्योंकि वह काफ़ी बार ग़लतियाँ करती है
लेकिन मै तुम्हे चेता दूँ कि बहुत कठोर मत बने रहना
क्योंकि तुम्हारा कोई भी कठोर दंड
उसके लिए एक चुनौती ही बन जाएगा
तुम्हारे दंड कि सार्थकता
अगर इसी में है
कि
उसे
उसकी ग़लती का अहसास हो तो
तो थोड़े कोमल बने रहना
एक मौन दृष्टि
और
एक पल का विराम काफ़ी है
उसे उसकी ग़लती का बोध कराने के लिए ।

हे घृणा के देवता -
तुम तो छूट जाना
पीछे रह जाना
इस सफ़र में उसके साथ मत जाना
मै नहीं चाहती
कि किसी से बदला लेने कि ख़ातिर
वह
अपने जीवन के कीमती वर्ष नष्ट कर दे

हे जगत की अधिष्ठानी माता !
तुम्हारी ज़रुरत मुझे उस समय पड़ेगी
जब वह थकने लगे
और उसे लगने लगे कि यह रास्ता अब कभी ख़त्म नहीं होगा
उसके क़दम जब वापसी की राह पर मुड़ जाएँ
और वह थक कर लौट आना चाहे
उस समय
तुम अपनी जादुई-शक्तियों से
दिशाओं को विपरीत कर देना
और
अपने सारे जगत की चिंता-फ़िक्र छोड़कर
मेरा रूप धारण कर लेना
और उसे अपने आँचल में दुबका कर
उसकी सारी थकान सोख लेना
 
और बस इतना ही नहीं
उसकी पूरी कहानी सुनना
चाहे वह कितनी ही लम्बी क्यों न हो
और हाँ !
उसकी ग़लतियों पर मुस्कुराना
मत वरना वह बुरा मान जाएगी
और
तुम्हें
कुछ नहीं बताएगी

जब उसकी आँखों में तुम्हे एक आकाश दिखने लगे
और होंठ मौन धारण कर लें
और उसकी एकाग्रता उसे एकाकी कर दे
तब तुम समझ जाना
कि
वह लक्ष्य में तल्लीन होकर चलने के लिए तत्पर है
तब
तुम चुपचाप चली आना

मै जानती हूँ कि वह
अब
तब तक चलेगी जब तक उसकी मंज़िल उसे मिल नहीं जाती ।

जाओ बेटी
अब तुम अपना सफ़र प्रारंभ कर सकती हो
तुम्हारी
यात्रा शुभ हो
मंगलमय हो... ।