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एक मामूली ज़िन्दगी में भी रहीं / कात्यायनी

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एक मामूली ज़िन्दगी में भी रहीं
दिल को डुबाती-डुबाती सी
कुछ यादगार उदासियाँ
और कुछ यादगार बेवफ़ाइयाँ
दिल को चीर-चीर जाती हुईं।
नाउम्मीदियाँ भी आईं
कभी हमलावर बनकर
कभी घुसपैठियों की तरह।
वो तो हम जीते रहे यूँ
कि हमारे पास फ़ुर्सत नहीं रही कभी
और यह भी कि और भी ग़म रहे बहुत सारे
और खुशियाँ भी कम न रहीं।
एक ग़ैरमामूली कारवाँ में शामिल रहे हम
हर शाम घायल, लस्त-पस्त
कहीं डालते थे पड़ाव
और हर सुबह ताज़ादम
आगे बढ़ जाते थे ।
ज़माने के लिए
कुछ और काले कोस काट जाते थे।

रचनाकाल : सितम्बर 1997