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एक सांत्वना / सूर्यदेव सिबोरत

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फिसल कर
चले गये हैं जो दिन
वक्त की उंगलियों से ।
दूर
टीलों पर
पोस्टर लिये
उड़ा रहे हैं
मेरे वजूद का मज़ाक ।

क्योंकि मैं
न कल था
न आज हूँ
न बिहान हूँगा ।
बस
राख का ढेर हूँ मात्र
किसी जमी चिता की ।

यह तो
एहसान है
न आनेवाले बिहान का
मुझ पर ।
जो एक पल
सहला सका है
मेरी खाक को ।