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ओ मेरे सब अपनों तुमसे / हरीश भादानी

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ओ मेरे सब अपनों तुमसे
मुझे बग़ावत करनी होगी !
अब तक जीली गई उमर को
मैंने तीखी धूप खिलाई,
सूरज की सौगंध मुझे हैं
मैंने भर-भर प्यास पिलाई,
अब तक जो बादल उभरे हैं,
डरे-डरे से ही उभरे हैं
सब मौसम परदेशी बनकर
मेरी गलियों से ग़ुजरे हैं,
हवा यहाँ इतनी भारी है
साँसे ही ले सकता केवल,
सपनों का जीवन क्या जीना-
सपनों को जनमाना मुश्किल !
ओ मेरे जैसे ही अपनी !
ऐसी सपनों खोर हवा को
मलयानिल का नाम दिया तो
मुझे अदावत करनी होगी !
भूले से बरखा तो आती
पर पानी नमकीन बरसता,
भावों का चातक बेचारा
भरमों को पी-पी कर रहता,
मधुमासों से परिचय कैसा-इनकी छाया भी अनजानी
सरसाँ की फसलों को कैसे-
कहदूँ होती बहुत सुहानी ?
सुना हुआ है, पढ़ा हुआ है-
मौसम तो बदला करते हैं
पर मेरी ड्योढ़ी पर पतझर-
बारह मास रहा करते हैं
ओ मेरे जैसे ही अपनो !
थकी हुई बेहोश रात को बासंती सम्मान दिया तो
मुझे अदावत करनी होगी !
पाले पोसे सब सपनों को
मैंने जिन्दा गाड़ दिया है
हिरनी सी भोली यादों को
तड़पा-तड़पा गार दिया है,
मैं कैसा हूँ, घर कैसा है इसका मुझको ज्ञान नहीं है,
जैसा भी बन पाया
इस पर मौसम का अहसान नहीं है,
फिर भी ज़िन्दा हूँ
इसलिए कि जीता हूँ अंगारे खाकर
बिना रूके चलता जाता हूँ
मैं सूखी मल्हारें गाकर
आ मेरे जैसे ही अपनो
तुमने इस बीमार घड़ी को जो सावन का नाम दिया तो
मुझे अदावत करनी होगी