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कंस्तांतिन कवाफ़ी / परिचय

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कवाफ़ी आधुनिक कविता के प्रणेता माने जाते हैं। 1863 में सिकन्दरिया, मिस्र में जन्मे कवाफ़ी की कविताओं से गुज़रें तो ज्ञात होता है कि उन्होंने यूनानी समाज-जीवन की विडम्बना को गहरे धँसकर अभिव्यक्ति दी। पतनशील समाज की गहरी छायाएँ जो इंसान को इंसान से दूर कर रही थीं -- कवाफ़ी ने गहरे अवसाद में डूबकर उन्हें ज़बान दी।

कवाफ़ी ने मात्र 154 कविताएँ लिखीं जो यूनानी समाज और उसके इतिहास का एक रचनात्मक इतिहास है जिसके जरिये हम तत्कालीन समय के सच से वाक़िफ हो सकते हैं। ऐतिहासिक संदर्भों को केन्द्र में रखकर कवाफ़ी ने जो कविताएँ लिखीं वह इतिहास के ब्यौरें नहीं वरन् जीवन की विद्रूपता के ब्यौरें हैं- उसमें हम आधुनिक जीवन के सच को कलात्मक सौंदर्य की आँच में देख-परख सकते हैं।

कवाफ़ी अपनी कविता को संग्रह के मार्फ़त नहीं वरन् स्थानीय अख़बारों और पत्रिकाओं के मार्फ़त जन-जन तक पहुँचाने के हिमायती थे। यही वजह है कि उनकी कविताओं का संग्रह उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुआ।

कवाफ़ी को अपने देश की सीमा से बाहर प्रसिद्धि उनकी अपनी पहली कविता ‘यथाका’ से मिलना शुरू हुई जो टी.एस. इलियट की पत्रिका ‘क्राईटेरियन’ में अँग्रेज़ी अनुवाद-रूप में प्रकाशित हुई थी।

कंस्तांतिन पी० कवाफ़ी का जन्म सन् 1863 में मिस्र के सिकन्दरिया नगर में हुआ था। वे यूनानी माता-पिता की नौंवी सन्तान थे। यूनानी आर्थोडाक्स चर्च में उनका बपतिस्मा हुआ। कवाफ़ी के पिता पीतेर अपने युवाकाल में ही ने कंस्तांतिनोपल शहर को छोड़ चुके थे। 1836 के आसपास वे अपने बड़े भाई जार्ज के साथ, मैनचेस्टर, लन्दन की एक फर्म में काम करने के लिए आ गए थे। वह एक यूनानी फर्म थी जो लंदन और लिवरपूल में कॉटन तथा मिस्री कपड़ा बेचा करती थी। लेकिन बहुत जल्दी कवाफ़ी के पिता पीतेर तथा उनके बड़े भाई को लगा कि उन्हें अपनी स्वयम् की ही कोई कम्पनी स्थापित कर लेनी चाहिए और 1946 में वे अपनी इस योजना में कामयाब हो गए।

कम्पनी का नाम ‘कवाफ़ी एण्ड कम्पनी प्राइवेट लिमिटेड’ रखा गया, जो बहुत जल्दी ही फलने-फूलने लगी, जिसके चलते उन्होंने ब्रिटिश नागरिकता भी प्राप्त कर ली। इसके बाद पीतेर ने 1854 में कंस्तांतिनोपल लौटकर एक हीरा व्यापारी जार्ज फोटियाडिस, की चौदह वर्षीया बिटिया हरिक्लिया से विवाह कर लिया। कुछ दिनों में पीटर, एक पुत्र के पिता बन गए और हरिक्लिया को अपने पिता के यहां ‘पेरा’ में छोड़कर वे वापस इग्लैण्ड चले गए।

वहाँ व्यवसाय को व्यवस्थित करने के बाद वे अपनी पत्नी और बच्चे को भी लिवरपूल ले आए। वे वहीं बस जाने की तैयारी में थे। परन्तु उन्हें कहाँ मालूम था कि अचानक महामन्दी का लम्बा दौर शुरू होने वाला है। कुछ वर्ष गुज़रने के बाद पीतेर कवाफ़ी का परिवार 1854 के आसपास मिस्र के सिकन्दिया नगर में आ गया और उनकी कम्पनी की सिकन्दरिया शाखा ही कम्पनी का मुख्यालय बना दी गई । 1870 में पीतेर अपनी कम्पनी तथा अपने परिवार को घोर आर्थिक संकट में छोड़कर इस संसार से विदा हो गए। बड़े बेटे ने फर्म तथा परिवार को संभालने का दायित्व अपने ऊपर लिया, लेकिन अपनी अनुभवहीनता की वजह से उसने पूरे परिवार को संकटों के नए-नए बादलों से घेर दिया। अपने नासमझ निर्णयों से कवाफ़ी परिवार लगभग बर्बादी के अंतिम छोर तक पहुँच गया था।

बहरहाल, कवाफ़ी ने, नौ वर्ष से लेकर अपनी उम्र के सत्रह वर्ष, जिन सामाजिक आर्थिक जीवन की विसंगतियों के साक्षी की तरह गुजारे, कदाचित उसी कालखण्ड ने उनकी सम्वेदना को तराशा और एक कवि-मानस की गढ़न्त भी तैयार कर दी। यहां यह बात बहुत महत्त्व की है, कि कवाफ़ी के जीवन के ये आरंभिक वर्ष ब्रिटेन में गुज़रे, नतीजन, न केवल उन्हें अंग्रेजी भाषा को लगभग एक ‘नेटिव-स्पीकर’ की तरह सीखा, बल्कि इंग्लिशमैनर्स तथा वहां के साहित्य का उनके जीवन और सोच पर गहरे तक प्रभाव पड़ा, जिसने उनके समूचे जीवन और रचनात्मकता पर अपना एक प्रत्यक्ष वर्चस्व बनाये रखा। कहा तो यह तक जाता कि जब वे अपनी भूल भाषा ग्रीक बोलते थे तो उनके ग्रीक उच्चारण में, अंग्रेजी भाषा का ध्वन्यात्मक प्रभाव स्पष्टतः दिखाई देता था। कहना न होगा कि उनकी पहली कविता अंग्रेजी में ही लिखी गई थी जिसके अंत में कवाफ़ी ने ‘कंस्तांतिन’ कवाफ़ी की तरह ही हस्ताक्षर किये हैं। अंग्रेजी जीवन और साहित्य का वर्चस्व उनके समचे लेखन पर रहा, फिर चाहे वह गद्य-पद्य हो, याकि आलोचनात्मक लेखन।

लन्दन से लौटकर कवाफ़ी ने यूनानी समुदाय के उच्च सांस्कृतिक वर्ग के परिवारों के लिए नियत ख्यात शिक्षण संस्थान, हर्मिस लायसेयम में दाखिला ले लिया, जहां उन्होंने कुछ समय तक अध्ययन किया। बस, उनके जीवन में औपचारिक शिक्षा उतनी ही रही। क्योंकि कवाफ़ी के आरंभिक जीवन के सम्बन्ध में बहुत ही कम जानकारी उपलब्ध हैं। कहते हैं कि अपने शिक्षण काल में कवाफ़ी ने अपनी कच्ची उम्र में ही एक ऐतिहासिक शब्दकोष तैयार किया था। इसके बाद 1882 में, ब्रिटेन द्वारा सिकन्दरिया पर बमबारी के बाद कवाफ़ी की माँ हरिक्लिया ने परिवार के सभी सदस्यों के साथ आत्मनिवार्सन में जाने का निर्णय किया और वे सिकन्दरिया छोड़कर चली गईं।

फिर तीन साल बाद ही वे अपने तीन छोटे बच्चों के साथ कंस्तांतिनोपल लौटीं और अपने पिता के घर में एक कमरे में रहने लगीं। यह घोर गरीबी और बदहाली का समय था। रिश्तों के द्वन्द्व, समाज की निर्दयता और उपेक्षा। निकट सम्बन्धियों का ममत्वरहित व्यवहार। जीवन का सन्तुलन छिन्न-भिन्न हो गया था। हालाँकि मां ही कवाफ़ी परिवार की भावनात्मक धुरी थी, लेकिन, आर्थिक अपंगता ने उन्हें दर-दर भटकने को मजबूर कर दिया था। एक बड़ी फर्म के सम्पन्न परिवार की दुरावस्था के वे सबसे असहनीय दुर्दिन थे।

इसी दौरान कवाफ़ी ने अपनी पहली कविता लिखी, जो अँग्रेज़ी, फ़्रांसीसी और यूनानी भाषाओं में थी। इस व्यथा के वलय में से बाहर निकलने के लिए, कवाफ़ी ने राजनीति और पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सक्रियता बढ़ाने की काफी गंभीर कोशिशें कीं, लेकिन, हर जगह दिक़्क़त एक ही बात की थी कि कवाफ़ी के पास कोई विधिवत ग्रहण की गई दःंग की शिक्षा नहीं थी। अन्त में तमाम कोशिशों के पश्चात् उन्हें सिकन्दरिया के एक अख़बार ने अपने यहाँ रख लिया और वे वहाँ सम्वाददाता के रूप में काम करने लगे।

बाद इसके 1888 में, वे इजिप्शियन स्टॉक एक्सचेंज में अपने भाई एरिस्टिडिस के सहयोगी के रूप में काम करने लगे। लेकिन इस समूची आपाधापी के बीच भी उनके भीतर कविता लिखने की इच्छा निरन्तर बलवती बनती गई। वे लिखते-पढ़ते रहे, जिसमें रिपोर्ट, गद्य-पद्य-आलोचनात्मक लेखन शामिल था जो अब अंग्रेजी शीर्षक के तहत ‘गिव बैक द एलगिन मार्बल्स’ से उपलब्ध है। कोई उनतीस वर्ष की उम्र में उन्हें लोक कार्य विभाग में एक सामान्य से क्लर्क की नौकरी मिल गई, तो उन्हें बड़ी तसल्ली हुई, हालांकि कई दफा बिना पगारी भी हो जाती। लगभग तीन वर्षों तक वे एक अस्थाई क्लर्क के रूप में इस उम्मीद के साथ काम करते रहे कि शायद कभी यहाँ उन्हें पूरी और नियमित सेवा के लिए रख लिया जायेगा। कहना न होगा कि सौभाग्यवश, चौथे वर्ष उन्हें स्पष्टतः एक ख़ाली पद के विरुद्ध नियुक्ति मिली, जहां उन्होंने तीस वर्ष तक काम किया। उन्हें ‘स्थाई’ होने में उनकी ग्रीक नागरिकता ने काफी व्यवधान पैदा किए क्योंकि, तब इजिप्ट पर ब्रिटेन का वर्चस्व था, लेकिन अंततः उन्हें सात पाउण्ड प्रति महीना मिलने लगा, जो धीरे-धीरे सेवानिवृति के समय तक तीस पाउण्ड तक पहुंच गया। तब तक उनके पद को सहायक निदेशक का मान लिया गया था। कुछ तथ्यों से जानकारी मिलती है कि मरने के कुछ समय पूर्व उन्हें होली कम्युनियन के लिए आर्थोडॉक्स चर्च ने स्वीकृति प्रदान की थी। कवाफ़ी ने एक तरह से एकाकी जीवन के अभिशाप को झेला। वे बहुत कम लोगों ने मिलना पसन्द करते थे। वे अपनी मृत्युपर्यन्त बूढ़ी मां और एक कुंवारे भाई के साथ, लगभग उपेक्षित जीवन जीते रहे, जबकि वे उम्र के उत्तरार्द्ध के बाद एक सामान्य उच्चमध्यवर्गीय परिवार के जीवन जीने लायक सामग्री जुटा चुके। उनके सेक्स जीवन के बारे में प्रामाणिक जानकारी अनुपलब्ध ही है, लेकिन वह सुखद नहीं था। क्योंकि जो शृंगारिक कविताएं उन्होंने लिखी हैं, वे भी उनके सेक्सजीवन के बारे में ठीक-सा सुराग नही देतीं। हालांकि, उनके दो बहुत थोड़ी-सी अवधि के प्रेम-प्रसंग हैं भी, जिनका संदर्भ पेशंस एण्ड एंशियण्ट डेज़’ में मिलता है।

कवाफ़ी ने अपने जीवन के उत्तरार्ध्द में विश्व के कई चर्चित साहित्यिक लोगों से बहुत अनौपचारिक और प्रीतिकर सम्बन्ध बनाये। अंग्रेजी लेखक ई.एम. फास्टर भी उनमें से एक रहे। बीसवीं सदी की कविता में कवाफ़ी का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान रेखांकित किया गया। एलेक्झेण्ड्रिया आनेवाला हर आदमी, कवाफ़ी से मिलना अपना सौभाग्य समझता था। उनसे मिलने वाला चमत्कृत हो उठता था कि ख़ासकर वे सुदूर अतीत के बखान में बहुत ही प्रवीण हैं तथा लगभग अविश्वसनीय से इतिहास को वे संप्रेष्य और स्वीकार्य बना देते हैं। बतरस भी उनका विलक्षण गुण था। कवाफ़ी ने अपने जीवन काल में शायद ही अपना कोई काव्य संकलन बिक्री के लिए उपलब्ध कराया हो। वे अमूमन अपने मित्रों और प्रसंशकों को या उन्हें जानने वालों को वो स्वयं के द्वारा छपवा ली गई पुस्तिकाएं दे देते थे। अमूमन वे खुले ब्राडशीट के रूप में कविता छपी होती जिन्हें वो बड़ी क्लिप से नत्थी करके फोल्डर में रखकर देते थे। जीवन के अंतिम वर्षों में ग्रीक के तानाशाह पेंगालोस द्वारा उन्हें ‘आर्डर ऑव फीनिक्स’ का सम्मान दिया गया। टी.एस. इलियट के ‘क्रायटेरियन’ में छपे, तथा टी.ई. लारेंस और आर्नाल्ड टॉयन्बी से कवाफ़ी के सम्पर्क ने उन्हें अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया। हालांकि एथेन्स के लिए वे अल्पज्ञात और अल्प स्वीकार्य ही रहे आये। उनकी इस साहित्यिक वृत्त में कुछ जल्द ही एक विशिष्ट पहचान इसलिए निर्मित हो गई कि उनकी कविता तत्कालीन ग्रीक मुख्यधारा की कविता के मुहावरे से सर्वथा भिन्न थी। ग्मदवचवचनसने नामक पत्रिका में उनकी कविताओं की विस्तृत व्याख्याएं हुईं। लेकिन, बावजूद इसके उनकी कविता ‘ग्रीक रचनात्मकता’ के लिए किसी तरह का प्रेरणापुंज की तरह अपनी प्रतिष्ठा नहीं बना पायी। कोई दो दशक बाद जब ग्रीक-तुर्की युद्ध में ग्रीस की पराजय हुई तब ग्रीक भाषा में एक निहिलिस्ट पीढ़ी का पदार्पण हुआ, जिसने अपनी चेतना का ‘साम्य’ कवाफ़ी में पाया और वृहद साहित्यिक दायरे में उनको नये ढंग से पहचाना गया। बिडम्बना यह कि जिन गुणों के कारण आज उन्हें वैश्विक स्वीकृति प्राप्त हुई, उन्हीं गुणों के कारण वे, जीवनभर अवमानना भोगने का आधार बने। 1935 में जब उनका काम संग्रह के रूप में सामने आया, तब उन्हें ग्रीक कविता का सार्वकालिक महान कवि माना गया। उनका बहुत बौद्धिक उत्तेजना पैदा करने वाला इतिहास बोध जिस तरह पूरी कविता को दीप्त करता है- वह स्वयं में एक अप्रतिम यथार्थ की शब्द सृष्टि करता है। कवाफ़ी ने कण्ठ के कर्करोग के क्रूर शिकंजे में पीड़ाग्रस्त रहते हुए अपनी अंतिम सांस ली लेकिन पश्चिम की दुनिया की परंपरा में वे एक अनिवार्य कड़ी की तरह हमेशा बने रहेंगे।


आधुनिक कविता के प्रणेता : कोंस्तांतिन पी. कवाफ़ी

बीसवीं सदी के शीर्ष यूनानी कवि, कोंस्तांतिन पी. कवाफ़ी जो अमेरिकी कवि वाल्ट ह्विटमैन के बाद, दुनिया में आधुनिक कविता के जनक भी माने जाते हैं। 1863 में जन्मे कवाफ़ी के जीवन और व्यक्तित्त्व की सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि जिस यूनानी इतिहास, संस्औति, समाज-जीवन और भाषा को उन्होंने अपनी कविता का आधार बनाया, उसे उन्हें किताबों के जरिये ही जानने को जीवन-भर अभिशप्त रहना पड़ा। यूनान की मिट्टी, पानी और हवा से तो वह वंचित रहे ही, जीते-जी यूनानी साहित्य और समाज में उन्हें पहचाना गया हो, इस बात के प्रमाण भी न-कुछ-से हैं। वे इस्कंदरिया [मिस्र] में पैदा हुए, पिता और माँ कोंस्तांतिनोपल के थे, किशोरावस्था और युवाकाल के कुछ वर्ष इंग्लैंड व कोंस्तांतिनोपल में बीते और फिर, सरकारी नौकरी करते हुए, पूरे जीवन वे इस्कंदरिया में ही रहे। कोई औपचारिक शिक्षा नहीं, कोई पारिवारिक जीवन नहीं। पहली कविता अंग्रेजी में लिखी, कुछ प्रारंभिक कविताएँ फ्रेंच में भी, उसके बाद संपूर्ण औतित्व यूनानी भाषा में। ग़ौरतलब यह भी है कि यूरोपी भाषा और साहित्य के लिए कवाफ़ी की खोज, उनके जीवन के अंतिम दौर में, प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक ई.एम. फॉर्स्टर ने की। उसके बाद ही टी.एस. इलियट की पत्रिका ‘क्राइटेरियन’ में कवाफ़ी की कविता ‘इथाका’ अंग्रेजी अनुवाद में छपी तथा आर्नाल्ड टॉयन्बी, टी.ई. लॉरेंस आदि को उनके काम में दिलचस्पी पैदा हुई। इन सारी हलचलों के बाद ही, कवाफ़ी के निधन, 1933 से कुल छह-सात साल पहले, यूनानी सत्तातंत्र को उनके महत्त्व का थोड़ा-बहुत अहसास हुआ। कवाफ़ी की कोई औति उनके जीवनकाल में प्रकाशित नहीं हुई। उनकी संकलित कविताओं का पहला पुस्तकाकार प्रकाशन उनके निधन के दो वर्ष बाद हुआ।