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कई शक्लों में खुद को सोचता है / शीन काफ़ निज़ाम

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कई शक्लों में ख़ुद को सोचता है
समुन्दर पैकरों का सिलसिला है

बदलती रुत का नोहा सुन रहा है
नदी सोई है, जंगल जागता है

बिखरने वाला ख़ुद मंज़र-ब-मंज़र
मुझे क्यूँ ज़र्रा-ज़र्रा जोड़ता है

हवा का हाथ थामे उड़ रहा हूँ
हवा फ़ासिल, हवा ही फ़ासला है

हुदूदे-अर्ज़ में गम होने वाला
उफ़ुक़ को इम्काँ-इम्काँ जानता है