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कभी तो फूल की रुत है कभी खिजां हूँ मैं / मेहर गेरा

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कभी तो फूल की रुत है कभी खिजां हूँ मैं
फ़क़त निखरने, बिखरने की दास्तां हूँ मैं

बरस के अब्र की मानिंद मुझको देख ज़रा
मैं रंगो-नूर का हामिल हूँ कहकशां हूँ मैं

बिख़र चुका हूँ मैं कितना किसे ये क्या मालूम
कहां कहां मैं नहीं हूँ कहां कहां हूँ मैं।

मुझे तलाश न कर मैं हूँ लहर दरिया की
अभी करीब था तेरे अभी वहां हूँ मैं

मैं अपने ज़ेहन के अंदर तवाफ़ करता हूँ
मैं रंगो-बू का सरापा हूँ गुलिस्तां हूँ मैं।