भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं / मजाज़ लखनवी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कमाल-ए-इश्क़[1] है दीवाना हो गया हूँ मैं ।
ये किस के हाथ से दामन छुड़ा रहा हूँ मैं ।

तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाख़ुदा दुनिया,
बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं ।

ये मेरे इश्क़ की मजबूरियाँ म'अज़-अल्लाह[2],
तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं ।

इस इक हिजाब[3] पे सौ बे-हिजाबियाँ सदक़े,
जहाँ से चाहता हूँ तुम्को देखता हूँ मैं ।

बताने वाले वहीं पर बताते हैं मंज़िल,
हज़ार बार जहाँ से गुज़र चुका हूँ मैं ।

कभी ये ज़ोम[4] कि तू मुझ से छुप नहीं सकता,
कभी ये वहम कि ख़ुद भी छुपा हुआ हूँ मैं ।

मुझे सुने न कोई मस्त-ए-बादा-ए-इशरत[5],
'मज़ाज़' टूटे हुये दिल की इक सदा हूँ मैं ।

शब्दार्थ
  1. प्यार का जादू
  2. भगवान की दया से
  3. परदा
  4. विश्वास
  5. ख़ुशी के नशे में डूबा हुआ