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कलकत्ता का यीशु / नीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती / देवदीप मुखर्जी

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लालबत्ती की रोक-टोक नहीं ,
फिर भी अचानक रुक गया
तूफ़ानी गति से भागता हुआ कलकत्ता शहर
भयंकर गति सँभाल थमकी टैक्सी और प्राइवेट गाड़ियाँ, टेम्पो, दोमंज़िला विराट बस
रास्ते के दोनों ओर से
'मरा मरा' की आर्तनादी चीख़ में
दौड़ आते
झाँका माथे मजूर, फेरीवाले, दुकानदार, ग्राहक
वे सब भी अब स्थिर चित्र जैसे चित्रकार के इजल में थमके हुए
स्तब्ध हो देखते सभी
रास्ते के एक ओर से दूसरी तरफ़
डगमगाते पाँव पैदल जाते हुए
नँग-धड़ँग शिशु को..

कुछ देर पहले ही बारिश हुई है यहाँ
चौरंगी में
अब धूप पुनः दीर्घकाय भाले की तरह
उतर आ रही है
बादलों को चीरती हुई
मायावी रोशनी में लिपटा कलकत्ता शहर
सरकारी बस की खिड़की पर मुँह टिकाए
एकबार आकाश, एकबार तुम्हें देखता..
भिखारी-माँ का शिशु,
कलकत्ता का यीशु,

किसी मन्त्रबल से रोक दिया समस्त ट्रैफ़िक तुमने
जन आर्तनाद, बेचैन ड्राइवर के वचन
किसी की परवाह नहीं तुम्हें..
दुतरफ़ा आती मृत्यु के धुर बीच में से
तुम निकलते डगमगाते हुए..
जैसे हो मूर्त मानवता. अभी चलना सीखने के आनन्द में
पाना चाहते हो समस्त विश्व को
अपनी मुठ्ठी में.. इसीलिए शायद
डगमगाते पैरों से
निकल पड़े हो
पृथ्वी के एक किनारे से दूसरे किनारे की ओर ...

कविता ’कोलकातार जीशु’ का मूल बांग्ला से अनुवाद : देवदीप मुखर्जी
 
अब यही कविता मूल बांग्ला में पढ़िए

লালবাতির নিষেধ ছিল না,
তবুও ঝড়ের বেগে ধাবমান কলকাতা শহর
অতর্কিতে থেমে গেল;
ভয়ঙ্করভাবে টাল সামলে নিয়ে দাঁড়িয়ে রইল
ট্যাক্সি ও প্রাইভেট, টেমপো, বাঘমার্কা ডবল-ডেকার।
‘গেল গেল’ আর্তনাদে রাস্তার দুদিক থেকে যারা
ছুটে এসেছিল—
ঝাঁকামুটে, ফিরিওয়ালা, দোকানি ও খরিদ্দার—
এখন তারাও যেন স্থির চিত্রটির মতো শিল্পীর ইজেলে
লগ্ন হয়ে আছে।
স্তব্ধ হয়ে সবাই দেখছে,
টালমাটাল পায়ে
রাস্তার এক-পার থেকে অন্য পারে হেঁটে চলে যায়
সম্পূর্ণ উলঙ্গ এক শিশু।
খানিক আগেই বৃষ্টি হয়ে গেছে চৌরঙ্গিপাড়ায়।
এখন রোদ্দুর ফের অতিদীর্ঘ বল্লমের মতো
মেঘের হৃৎপিণ্ড ফুঁড়ে
নেমে আসছে;
মায়াবী আলোয় ভাসছে কলকাতা শহর।
স্টেটবাসের জানালায় মুখ রেখে
একবার আকাশ দেখি, একবার তোমাকে।
ভিখারি-মায়ের শিশু,
কলকাতার যিশু,
সমস্ত ট্রাফিক তুমি মন্ত্রবলে থামিয়ে দিয়েছ।
জনতার আর্তনাদ, অসহিষ্ণু ড্রাইভারের দাঁতের ঘষটানি,
কিছুতে ভ্রুক্ষেপ নেই;
দু’দিকে উদ্যত মৃত্যু, তুমি তার মাঝখান দিয়ে
টলতে টলতে হেঁটে যাও।
এযেন মূর্ত মানবতা, সদ্য হাঁটতে শেখার আনন্দে
সমগ্র বিশ্বকে তুমি পেতে চাও
হাতের মুঠোয়। যেন তাই
টাল্‌মাটাল পায়ে তুমি
পৃথিবীর এক-কিনার থেকে অন্য-কিনারে চলেছ।