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कल तक था नाम जिनका बदनाम बस्तियों में / राजेंद्र नाथ 'रहबर'

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कल तक था नाम जिनका बदनाम बस्तियों में
चलते हैं आज उनके एह्काम[1] बस्तियों में

हर-सू[2] मचा हुआ है कुहराम बस्तियों में
तह्ज़ीब[3] हो न जाये नीलाम बस्तियों में

घोला था ज़हर किसने कोई न जानता था
तेगें[4] खिंची हुई थीं इक शाम बस्तियों में

जिनके नफ़स-नफ़स में तख़रीब बस रही है
ऐसे हलाकुओं का क्या काम बस्तियों में

कोई न हो शनासा[5] कोई न जानता हो
आओ कि जा बसें हम बे-नाम बस्तियों में

सूने पड़े हैं मन्दिर, वीरान मस्जिदें हैं
धूमें मची हैं क्या-क्या बदनाम बस्तियों में

सब शोरिशें हों `रहबर' नापैद बस्तियों से
अमन-ओ-अमाँ का फैले पैग़ाम[6]बस्तियों में

शब्दार्थ
  1. हुक्म का बहुवचन
  2. चारों ओर
  3. सभ्यता
  4. तलवारें
  5. परिचित
  6. संदेश