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कल / हरीश करमचंदाणी

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पीछे मुड़-मुड़ कर देखना चाहता हूँ
पर नहीं देखता
देखता हूँ तो आगे
नया कुछ जो नहीं देखा अब तक
आगे ही तो हैं
हाँ ,आगे ही तो हैं
जिसे पा लेने को चलते हैं सब
नहीं हैं जो मरीचिका
तय हैं
आगे हैं
समय की अनंत नदी
जिसमे बहता जल
कल कल
होगा अपूर्व अनुपम
हाँ ,आने वाला कल