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कविता सुनाई पानी ने-6 / नंदकिशोर आचार्य

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कोई पर्याय नहीं होता
किसी संज्ञा का
सर्वनाम हो सकता है किसी का भी
संज्ञा नहीं मिलती किसी से
सर्वनाम घुल जाते एक-दूसरे में
जैसे मैं और तुम
हो सकते मिलकर
हम

काटती है संज्ञा
जोड़ते हैं सर्वनाम
इसीलिए बस तुम कहता हूँ तुम्हें
कविता में नहीं लिखता हूँ
तुम्हारा नाम ।