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कविता / भरत ओला

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उनकी नजरों में
कविता लिखना फैशन है
तभी तो पड़ौसी ‘गिरजा’
लिख-लिख कर कविताएं
उड़ा देता है जैसे- पतंग
मैंने कितनी ही बार
लिखनी चाही कविता
पर लिखी नहीं गई ।
आज
जब कव्वै ने
ऊंट की टाटर पर
मारी चोंच
तो न मालूम
कहां से आ कर
पसर गई
कविता
टाटर पर !

अनुवाद : नीरज दइया