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कहते हैं जिसे अब्र वो मैख़ाना है मेरा / बृज नारायण चकबस्त

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कहते हैं जिसे अब्र[1] वो मैख़ाना[2] है मेरा
जो फूल खिला बाग़ में पैमाना[3] है मेरा ।

क़ैफ़ीयते गुलशन[4] है मेरे नशे का आलम[5]
कोयल की सदा[6] नार-ए-मस्ताना[7] है मेरा ।

पीता हूँ वो मैं[8] नशा उतरता नहीं जिसका
खाली नहीं होता है वो पैमाना है मेरा ।

दरिया मेरा आईना है लहरें मेरे गेसू[9]
और मौज[10] नसीमे सहरी[11] शाना[12] है मेरा ।

मैं दोस्त भी अपना हूँ अदू[13] भी हूँ मैं अपना
अपना है कोई और न बेगाना है मेरा ।

ख़ामोशी में याँ रहता है तफ़सीर[14] का आलम
मेरे लबे ख़ामोश पै अफ़साना है मेरा ।

मिलता नहीं हर एक को वो नूर है मुझमें
जो साहबे बी निश[15] है वो परवाना है मेरा ।

शायर का सख़ुन कम नहीं मज़ज़ूब की बड़ से
हर एक न समझेगा वो अफ़साना है मेरा ।

शब्दार्थ
  1. बादल
  2. शराबख़ाना
  3. प्याला
  4. उद्यान का दृश्य
  5. नशे की हालत
  6. आवाज़
  7. मतवालों की आवाज़
  8. मद्य
  9. जुल्फ़ के बाल
  10. लहर
  11. प्रभात की वायु
  12. कौंधा
  13. दुश्मन
  14. वकृत्व
  15. दृष्टि रखने वाला