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कहां नहीं हो तुम / मनीषा पांडेय

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कहां नहीं हो तुम
मेरे कानों में बजता
धरती का कोई कोई ऐसा राग नहीं
जिसमें तुम बज न रहे हो
कोई ऐसी नदी नहीं
जो तुमसे होकर नहीं गुजरती
ब्रह्मांड के किसी भी कोने में
बारिश की कोई ऐसी बूंद नहीं गिरती
जो तुम्‍हारे बालों को न भिगोए
धरती के आखिरी छोर से बहकर आती है
जो हवा
मुझे छूने
तुमसे ही होकर गुजरती है
फूल कहीं भी खिलें, प्‍यार कहीं भी जन्‍मे
सब में तुम ही होते हो हमेशा