भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कहिया ऐतै घुरी फेरू कान्हा रे कौआ / नवीन चंद्र शुक्ल 'पुष्प'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कहिया ऐतै घुरी फेरू कान्हा रे कौआ
उचरी ऐंगनमा बताय दे
हमरो संदेशा लै केॅ कौआ कान्हा केॅ सुनाय दे

आँखी नै नींद आरो चैनो नै मनमा
औटतेॅ रहै छै हरदम्मे परनमा
मिट्ठोॅ मूॅ तोरोॅ करी देवौ रे कौआ कान्हा केॅ हमरोॅ बुलाय दे

जहिया सें गेलै कान्हा पतियो नै पैलां
चिंता सें जी भरी कहियो नै खैलाँ
सब्भे दिन हमरै कन रहियैं रे कौआ कान्हा सें जों तोंय मिलाय दे

भोर होथैं आवै के असरा लगाय छी
लोर केॅ चुआय साँझैं मन केॅ बुझावै छी
यहेॅ रं बितावै छी दिन रात रे कोआ कान्हा केॅ जाय बताय देॅ

कीजन गेलियै कौनें धुरियैलकै
जेकरा सें हमरा एकदम भुलैलकै
जिनगी भरी तोरोॅ गुण गैवोॅ रे कौआ कान्हा के मन केॅ फिराय दे

करै छै मोॅन धोंस यमुना में दै दौ
आगिन लगाय लौं पीवी जहर लौं
कान्हा बिनु एक्को क्षण नै जीवै रे कौआ तोहीं करीं कौय उपाय दे

सोहैतेॅ सोहावै नै ऐंगना दुअरिया
आँखी तोर कान्हा के मोहिनी सुरतिया
तोरै साथ हम्में उड़ी जैवै रे कौआ कान्हा लग हमरा पहुॅचाय दे

कहियो नै झूठ होय छै तोरोॅ उचरवोॅ
केकरो न केकरो होय छैं दुअरी उतरवोॅ
गल्ला के हरवा पिन्हैवौ रे कौआ कान्हा से जों तांेय मिलाय दे