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कहीं तुझ में मैं हूँ या रब कहीं मुझ में तू बसा है / रविकांत अनमोल

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ये अजीब है पहेली, ये अजीब माजरा है
कहीं तुझ में मैं हूँ या रब कहीं मुझ में तू बसा है

इक तू ही तू है या रब दुनिया में और क्या है
तू ही बोलता है मुझ में तु ही मुझ को सुन रहा है

तेरे नूर से है रौशन वो हो चाँद या कि सूरज
तेरी रहमतें हैं उस पर हर फूल जो खिला है

मेरी अक्ल है परेशां मुझे कुछ समझ न आए
कि मैं जिस के रूबरू हूँ वो सनम है या खुदा है

हर शैअ में तुझको देखूँ मुझे वो निगाह दे दे
तू ही तू हो ज़िंदगी में तो कुछ और ही मज़ा है

उसे क्या खुशी खुशी की उसे ग़म भी क्या है ग़म का
तेरे इश्क़ में जो डूबा कि जो तेरा मुब्तिला है

दर-दर भटक चुका हूँ हर दर पे जा के देखा
मैं जहां जहां गया हूँ हर दर पे तू मिला है

तुझे पा सकूँ न पा कर तुझे खो के खो न पाऊँ
है मेरी खुशी इसी में जो यही तेरी रज़ा है

मुझे ठोकरों में रखना, कि तू तख़्त पर बिठाना
हर पल क़रीब रहना यही मेरा मस'अला है

तेरे दम पे चल रही है मेरी ज़िंदगी की कश्ती
है मेरा ख़ुदा भी तू ही तू ही मेरा नाख़ुदा है

महसूस तुझको कर के, हर पल मैं झूमता हूँ,
जो उतरता ही नहीं है, ये अजीब सा नशा है