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कहो किसकी भूल ! / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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मिले न कूल
कहो किसकी भूल
ठोकरें खाईं
जीवन भर चले
साँझ -से ढले
प्रहार आतप के
सहते रहे
किनारा छूट गया
बहते रहे
जिनको प्यार किया
उनकी घृणा
सदैव पीते रहे
मृत्यु पर्व -सा
जीवन जीते रहे
मन में रहे
जो एक प्राण बन
चोटें उन्हीं की
पड़ी थीं बार -बार
घाव न भरे
शब्द-बाण बींधते
रिश्तों की फाँसी
गले में पड़ी रही
दर्द ही मिला।
रुलाती हर घड़ी
नरक-सी ज़िन्दगी।
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