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कह दो उनसे जो लाखों जुल्म किया करते हैं / सांवर दइया

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कह दो उनसे जो लाखों जुल्म किया करते हैं।
हम बीज हैं और बीज बाग़ी हुआ करते हैं।

आपका तो सहलाना भी तिलमिला देता है,
भला ऐसे भी किसी के जख्मों को छुआ करते हैं?

हक तो झुलस रहे एक ज़माने से लेकिन अब,
अस आग में तू भी झुलसे, यह दुआ करते हैं।

हर गली के हर मोड़ पर बर्फ फेंकने वालो!
शोले जो भड़क उठे यूं नहीं बुझा करते हैं।

कांप उठती हैं हवेलियां जब भूखे फुटपाथ,
हलक़ में हाथ डाल हक लेने को तुला करते हैं!