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काँटे ही काँटे / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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बरस बीते
पता अब है चला-
जीना कठिन
जीवन पथ पर
काँटे ही काँटे
लगता यही अब-
मृत्यु सरल
जीवन पथरीला
बड़ा हठीला
पल-पल घुटना
पीना गरल
लिये सातों जो फेरे
बने संत्रास
करकते दिल में
निशि-वासर
बन बाँस की फाँस।
मन के धागे
बँधे जिसके साथ
बिना फेरे के
बस वही समाया
मन-प्राण में
हर ले गई ताप
सभी सन्ताप
उसकी ही छुवन
खिला मन आँगन।