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कांच के शो रूम वाली झूठ की दुकान है / सूरज राय 'सूरज'

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कांच के शो रूम वाली झूठ की दुकान है।
है वहाँ ईमान नौकर, सच वहाँ दरबान है॥

घर, गली, सड़को-शहर में सिर्फ़ मेरे पोस्टर
आईना ही घर का मेरी शक़्ल से अंजान है॥

दोस्ती आओ करें इक साँस लेती रूह से
जिस्म से क्या दोस्ती हो जिस्म तो बेजान है॥

गोलियाँ, तलवार, बरछे अम्न की ख़ातिर चलें
इस गणित पर चल रहा जो मेरा हिंदुस्तान है॥

सैकड़ों कांधे मयस्सर हैं जनाज़े के लिये
ये कोई मुफ़लिस नहीं है ये कोई सुल्तान है॥

साब की बैठक में बैठा है अकड़ कर कैक्टस
गांव में आँगन की तुलसी का बड़ा सम्मान है॥

शीशमहलों के दिलों में झांक के देखें ज़रा
दास्ताँ में बस अँधेरा, रोशनी उन्वान है॥

दिल किराये पर उठाना है किराया तय है दिल
शर्त है रहने को वह ही आए जो इंसान है॥

क्या यक़ीं "सूरज" पर हो छल है सुबह से शाम तक
कश्मकश में जिस्म है, परछांई भी हैरान है॥