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काठ / शंख घोष

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एक दिन उस चेहरे पर अपरिचय की आभा थी।
हरी महिमा थी, गुल्म थे, नामहीन उजास
आसन्न बीज के व्यूह में पड़ी हुई थी आदिमता
और जन्म की दाईं ओर थी हड्डियाँ, विषाक्त खोपड़ी !
शिराओं में आदिगन्त प्रवहमान डबरे थे
अकेले वशिष्ठ की ओर स्तुति बनी हुई थी आधीरात
शिखर पर गिर रहे थे नक्षत्र और
जड़ों में एक दिन मिट्टी के अपने तल पर थी
हज़ारों हाथों की तालियाँ.
पल्लवित टहनियाँ सीने की छाल से दूर
स्वाधीन अपरिचय में झुककर एक दिन
खोल देते थे फूल.
और आज तुम सामाजिक, भ्रष्ट, बीजहीन
काठ बनकर बैठे हो

अभिनन्दन के अन्धेरे में !

मूल बंगला से अनुवाद : उत्पल बैनर्जी