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कारवाँ / बाल गंगाधर 'बागी'

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ज़माना है पहुंचा कहाँ से कहाँ
तुम खड़े हो वहीं तुम खड़े थे जहाँ
दुनिया की नजर में मैं इंसान क्या
दलित बन जहाँ था वहीं पे रहा
आओ देखो यहाँ तूफां का काफिला
एक कदम आगे बढ़ता नहीं मैं चला
गरीबी मेरी जाति ओढ़ी रही
ठण्ड से झोपड़ी में बरसता रहा
आंसुओं का समंदर हिकारत1 यहाँ
महफिलों में मेरा कुछ दम खम न रहा
लोग प्यालों में दुनिया सजाते रहे
भूख से मैं तड़पता-तड़पता रहा