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काला मुरब्बा / सिर्गेय तिमफ़ेइफ़ / अनिल जनविजय

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हवा सो रही है। रात बहुत कोमल है।
थक गया है आदमी, झगड़ा करना चाहता है।
वह जल्दी में है। वह उठता है
वह काले मुरब्बे की शीशी के पास जाता है।

शीशी की तली में बचा मुरब्बा निकालता है, इन्तज़ार करता है,
और मुरब्बा वापिस शीशी में डाल देता है।

वह थक गया है, अब होशियार हो गया है
वह रोता है, रो रहा है, चुपचाप रो रहा है।
तुम तो सब कुछ जानते हो, सबको समझते हो

तुम चाहते क्या हो , दिल मेरा, अभी भी चाहते हो?
मुझे नीचे से उलीचो, मेरी तली में से
काले मुरब्बे की तरह।

मूल रूसी भाषा से हिन्दी में अनुवाद : अनिल जनविजय

लीजिए, अब यही कविता मूल रूसी भाषा में पढ़िए
             Сергей Тимофеев
           ЧЕРНОЕ ВАРЕНЬЕ

Ветер спит. Ночь нежна.
Человек устал и хочет ссоры.
Он спешит. Он встает.
Он подходит к черному варенью.
Зачерпнет, подождет,
А потом обратно скинет в банку.
Он устал, стал умней,
Плачет, плачет, тихо-тихо плачет.
Знаешь всё, знаешь всех,
Так чего ты, сердце, еще хочешь?
Зачерпни мне со дна
Черного варенья.