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कितने ही फ़साने याद आए कितने ही सहारे याद आए / ख़ुर्शीद अहमद 'जामी'

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कितने ही फ़साने याद आए कितने ही सहारे याद आए
तूफ़ान ने बाहें फैला दीं जिस वक़्त किनारे याद आए

दीवार से लग कर सोचूँ की उम्मीद का सारा दिन गुज़रा
जब रात हुई तो हम को भी सब ख़्वाब हमारे याद आए

पैमान-ए-वफ़ा के सीने से फिर आज लहू टपका ‘जामी’
जो राह में थक कर बैठ गए अहबाब वो सारे याद आए