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किरण अब मुझ पर झरी / अज्ञेय

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किरण अब मुझ पर झरी
मैंने कहा :
मैं वज्र कठोर हूँ-
पत्थर सनातन ।

किरण बोली :
भला ? ऐसा !
तुम्हीं को तो खोजती थी मैं :
तुम्हीं से मंदिर गढूँगी
तुम्हारे अन्तःकरण से
तेज की प्रतिमा उकेरूँगी ।

स्तब्ध मुझ को
किरण ने
अनुराग से दुलरा लिया ।